Monday, January 14, 2008

-मेरी पहचान -

एहसास नहीं कुछ खोने का या कुछ पाने का,
तो दर क्यों है अकेले रह जाने का
कभी महसूस नहीं हुआ किसी से बिछड़ने का गम
या समझ ही नहीं पाए बिछड़ना होता है क्या ?.....

बस यह जाना कि कुछ लोग आये और कुछ गए अब तक,
कभी सोचता हूँ आखिर मिलूंगा कितनों से यह सांसें थमने तक
चले गए कुछ, कुछ दिनों में - पर याद छोड़ गए मन के कई कोनों में
उनके जाते ही हम खोज रहे खुदको , लेकिंn कैसे खोजें जब मेरी पहचान जो थे वो ही खो गए

-राहुल मिश्र

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