Thursday, January 17, 2008

-समय और शब्द-

वो मेरे ह्रदय से निकले शब्द होठों से यों टकराए,
एय हसीं हम आपसे चाहकर भी न कुछ कह पाए,
स्वप्न में तुम दिखती हो अब धुंधली से क्यों,
फिर सोचता हूँ जल्द ही तुम्हें वह बात कह दूँ,
लेकिन स्वप्न से उठ जाने का दर सा है,
साथ ही आपको खो देने का भय सा है,
हम आपको तो क्या आपकी छाया को भी न पा सके,
आज भी हम आपको चाह कर भी न चाह सके.....

-राहुल

Monday, January 14, 2008

-कुछ तो कह दो-

महफिल/दुनिया में अकेले रह जाओगे, कुछ तो बातें किया करो,
ज़ुबा अगर कुछ ना कह पाए, तो कुछ लफ्ज़ कलम से ही लिख दिया करो

-राहुल

-मेरी पहचान -

एहसास नहीं कुछ खोने का या कुछ पाने का,
तो दर क्यों है अकेले रह जाने का
कभी महसूस नहीं हुआ किसी से बिछड़ने का गम
या समझ ही नहीं पाए बिछड़ना होता है क्या ?.....

बस यह जाना कि कुछ लोग आये और कुछ गए अब तक,
कभी सोचता हूँ आखिर मिलूंगा कितनों से यह सांसें थमने तक
चले गए कुछ, कुछ दिनों में - पर याद छोड़ गए मन के कई कोनों में
उनके जाते ही हम खोज रहे खुदको , लेकिंn कैसे खोजें जब मेरी पहचान जो थे वो ही खो गए

-राहुल मिश्र