वो मेरे ह्रदय से निकले शब्द होठों से यों टकराए, एय हसीं हम आपसे चाहकर भी न कुछ कह पाए, स्वप्न में तुम दिखती हो अब धुंधली से क्यों, फिर सोचता हूँ जल्द ही तुम्हें वह बात कह दूँ, लेकिन स्वप्न से उठ जाने का दर सा है, साथ ही आपको खो देने का भय सा है, हम आपको तो क्या आपकी छाया को भी न पा सके, आज भी हम आपको चाह कर भी न चाह सके..... -राहुल
एहसास नहीं कुछ खोने का या कुछ पाने का, तो दर क्यों है अकेले रह जाने का कभी महसूस नहीं हुआ किसी से बिछड़ने का गम या समझ ही नहीं पाए बिछड़ना होता है क्या ?.....
बस यह जाना कि कुछ लोग आये और कुछ गए अब तक, कभी सोचता हूँ आखिर मिलूंगा कितनों से यह सांसें थमने तक चले गए कुछ, कुछ दिनों में पर याद छोड़ गए मन के कई कोनों में कुछ ऐसे भी थे जो अर्सों साथ दे गए, उनके जाते ही हम खोज रहे खुदको , लेकिंग कैसे खोजें जब मेरी पहचान जो थे वो ही खो गए
This blog is about how i see the things around me. The various dimensions of my thinking vis: political, social, my travels, my experiences and all those thing on earth that i can think of
i am a ceaseless thinker and keep on thinking like flowing waters in a river......i think of anything and everything that exists on this earth, worthwhile or immaterial.....i can't help myself...thats the way i am