Thursday, January 17, 2008

-समय और शब्द-

वो मेरे ह्रदय से निकले शब्द होठों से यों टकराए,
एय हसीं हम आपसे चाहकर भी न कुछ कह पाए,
स्वप्न में तुम दिखती हो अब धुंधली से क्यों,
फिर सोचता हूँ जल्द ही तुम्हें वह बात कह दूँ,
लेकिन स्वप्न से उठ जाने का दर सा है,
साथ ही आपको खो देने का भय सा है,
हम आपको तो क्या आपकी छाया को भी न पा सके,
आज भी हम आपको चाह कर भी न चाह सके.....

-राहुल

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